दस हज़ार लड़ की चटाई हैं – पठाका





बड़की(राधिका मदन) और छुटकी(सान्या मल्होत्रा), जब से माँ की खोक से निकले हैं तब से उनकी हर सुबह एक दूसरे से मुक्का-लात के बम और अनगिनत गालियों की चुटपुटिया फोड़ने से ही होती हैं मानो उनको अपनी निजी शान्ति एक दूसरे से लड़ने में ही मिलती हो| कपड़े, बीड़ी, बॉयफ्रेंड, दूसरे की सफलता और अपनी हार, कुछ भी उनके बीच युद्ध शुरू करने के लिए उपयुक्त हैं| पटाखे को आग लगाने के लिए डिपर(सुनील ग्रोवर) जो की गांव का मसखरा हैं हमेशा नारद की तरह मौजूद रहता हैं, उसका मानना हैं की यह दोनों भारत-पाकिस्तान की तरह हैं और इनके लड़ते रहने में ही जनता का मनोरंजन हैं|




रोज़-रोज़ के उनके झगड़ो ने उनके पिता को दिवाली की रात के बाद सड़क पे फैले कूड़े की तरह कर छोड़ा हैं , उसका यही सपना हैं की शादी के बाद जब ये अपने-अपने ससुराल को निकलेंगी तभी इस युद्ध को विराम मिलेगा| सरकारी बाबू को घूस देने के लिए वो बड़की का विवाह गाँव के रंडवे ठरकी पटेल से चार लाख रूपए में तय करता हैं, मेहँदी की रात पर बड़की और शादी की रात छुटकी अपने-अपने बॉयफ्रेंड के साथ भाग निकलती हैं| दोनों विवाह उपरान्त जब ससुराल पहुँचती हैं तो पता चलता हैं की दोनों के पति आपस में सघे भाई हैं और अब इस नयी दीवाली की कोई सुबह नहीं हैं|

पठाका, चरन सिंह पथिक के अफ़साने ‘दो बहनें’ पे आधारित हैं जिससे विशाल भरद्वाज ने बहुत ही खूबसूरती से सिनेमा के लिए एडाप्ट किया हैं, हमेशा की तरह भरद्वाज अपनी फिल्म के किरदारो को अपने सपनो को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने देते हैं| फिल्म के सेकंड-हाफ में प्लाट की कमी हैं पर भरद्वाज आपको ऐसा मह्सूस नहीं होने देते और दोनों बहनो को मोहरा बना भारत-पाकिस्तान के राजनैतिक रिश्तो पे कमेंट करते हैं, हाँ अगर सिम्बोलिस्म थोड़ा और होता तो मज़ा दुगना हो जाता|

भरद्वाज और गुलज़ार की जोड़ी ने आज तक कोई ख़राब गाना नहीं दिया और ये प्रथा इस फिल्म में भी कायम रहती हैं, श्रीकर प्रसाद की एडिटिंग इतने कमाल की हैं आप कुर्सी पे जम से जायेंगे| कोई भी अदाकार एक लम्हे के लिए भी चटाई के शोर को कम नहीं होने देता|

134 मिनट जलने वाली ये चटाई आपके फेफड़ो को हसीं के धुएं से भर देगी|
रेटिंग 3.8/5